देश के भिन्न-भिन्न शहरों में बहुत से महाविद्यालय हैं। इनके छात्रावास में दाख़िला लेने के पश्चात् ही हिन्दी, हिन्दू, हिंदुस्तान की सार्थकता स्पष्ट होती है। चाहे सुदूर आदि शंकराचार्य का द्रविड़ देश हो या माँ कामाख्या का पूर्वोत्तर, छात्रावास में तो सभी बंधु हिन्दी ही बोलते हैं। टूटी-फूटी ही सही, बांग्ला, अंग्रेज़ी एवं स्थानीय बोलीयुक्त ही क्यों न हो, या फिर तेलुगू फ़िल्मों के हिन्दी डब की टपोरियों वाली बोली घुल-मिलकर हिन्दी ही होती है। आधुनिक पंचमेल खिचड़ी, आधुनिक काल की सधुक्कड़ी है। आत्मा-परमात्मा की चर्चा न होकर लैब, पेपर, परीक्षा ही विषय होता है। बहुत घंटे और चाय की प्यालियाँ इसमें निकल जाती हैं कि फलाना चीज़ को किसके घर में क्या बोलते हैं। इसके बाद बड़ा विषय होता है कि कौन-सा तीज-त्योहार कैसे मनाते हैं। “अतर्क एक पंथ के, सतर्क पंथ हों सभी” तो नेता, चिंतक, राष्ट्रनिर्माताओं के लिए ही उपदेश है, हमें तो बाघ की खाल उधेड़ने में ही सुख मिलता है।
ऐसे ही एक अवसर रहता है शादी का। अब जो आसपास के बच्चे हैं उनके भाईबहिनों की शादियों में पूरे बैच को ही न्योता जाता है। अकसर तो लड़कियां ठुकरा देती हैं और प्रतिनिधित्व की ज़िम्मेदारी हम लौंडे लोग ही उठा लेते हैं। अगर ये बहनें जाए तो कुछ और ही बात होती है, लेकिन आज उसकी चर्चा का वक़्त नहीं। लड़के जाते तो हैं लेकिन हमें दुनियादारी कहां? मां, बहनें (मेरे लिए DD) और गर्लफ्रेंड (मुझपे एप्लिकेबल नहीं) को ही क्या पहिनना है, क्या देना है, कब जाना है सोचना होता है। अगर कोई लड़का इन शतप्रतिशत जनाना कर्मों में नाक घुसाए तो उसको उसके ही भाई अंकल की श्रेणी में डाल देते हैं। अब अंकल ही सही। काम होना चाहिए।
क्या देना है और कौन लायेगा इस विष्य में बहुत दोस्तियां अपने खंडन बिंदु पे आ जाती हैं। दरअसल किसी को जाना नहीं, क्या देना पता नहीं लेकिन क्या क्या नहीं देना चाहिए उसपे तो जम के विचार हैं। लेकिन किसी तरह समान आ जाए चंदे से (कम से कम एक जोड़ी तो हफ्ते भर बात नहीं करेगी इसके बाद) तो सवाल होता है जाने आने रुकने का। शुरुवात में सब को शादी घर में रुकना होता है। लेकिन फिर ईरान में पारसियों की भांति समय के साथ इनकी संख्या इतनी कम हो जाती है कि इनपे ध्यान देने की अधिक आवश्यकता नहीं है।
अंत में गाड़ी की जाती है, इसलिए नहीं कि सब सज धज के जा रहे हैं कहीं शेरवानी बस में मुड़ न जाए बल्कि इसलिए क्योंकि जिसके घर में शादी है वो तो पहले ही निकल गया है और बाकियों को क्या पता अपने प्रदेश के बाहर के रास्तों के बारे में। गाड़ी में 2 मुख्य किदार होते हैं। एक जो ड्राइवर के साथ बैठेगा (अंग्रेज इसे Shotgun कहते हैं, उधर ये जगह बहुत डीमांड में हे) और दूसरा जो जाना बजाए। जितना सुगम DJ वाले बाबू का किरदार है उतना ही कम पसंद किया जाता है Shotgun को। आम तौर पर अंकल लोग ही इधर जाते हैं। रस्ते में 15 20 बार तो पीछे मुड़ मुड़ कोशिश की जा सकती है ये जानने की उधर लोग हस क्यों रहे हैं, लेकिन एक समय के बाद ड्राइवर ही आपका सहारा रह जाता है। लौटते वक़्त लेकिन ये दोनों एक में विलीन हो जाते हैं। आखिर ड्राइवर के साथ वाले को जागना है सब की सुरक्षा के लिए तो संगीन की बागडोर उसके हाथ में देना उठा कुछ बड़ा त्याग लगता नहीं किसी को। चाहे कितना ही बड़े अनुसंधान संस्थान के ही लोग क्यूं ना हो, भूत प्रेत की "आपबीती" कहानियां बोली ही जाती हैं गाड़ी में।
अब आखिर आप पहुंच जाए तो स्टेज में दुल्हन के साथ तस्वीर उठाई जाएगी। उसका भाई आपका परिचय करायेगा (अक्सर परिचय होगा कि ये फलाना है कॉलेज से, अमुक प्रदेश या ज़िले का रहने वाला है) । उसके बाद हम खाने पर टूट पड़ते हैं। खाना खत्म हो, मिठाई और पुचके भी जम कर खा लिए आए तो ये टुकड़ी अपने आप को फेरे गिनने से ऊपर समझते हुए वापिस आने की मांग करती है। 10 15 मिनटों में सबको एकत्रित किया जाता है और मना लिया जाता है। लड़कियों के लिए दुल्हन की एक (१) तस्वीर ली जाती है और काफिला वापिस आ जाता है । अब जब कर्मकांड देखे ही नहीं तो अंतर का पता नहीं चलता। लेकिन तो बात चीत, हसी मज़ाक और टांग खींचाई होती है उससे ही हम सब एक है का संदेश मिल जाता है। और आमतौर पर किशोर कुमार और आइटम सॉन्ग के बीच डोलते हुए आप आधी रात छात्रावास की और निकल जाते हैं।

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